नागपुर. कार्यालय प्रमुखों से अपेक्षा है कि वे शासन निर्णयों की न्यायोचित भावना को अपनी कार्यप्रणाली और प्रशासन में प्रतिबिंबित करें। इससे यह सुनिश्चित हो कि किसी भी कर्मचारी को अन्याय का अनुभव न हो। वेतन वृद्धि और स्थानांतरण जैसे मामलों के लिए शासन ने स्पष्ट निर्णय जारी किए हैं। इन नियमों का कठोरता से पालन हर स्तर पर होना चाहिए, ऐसा महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण, नागपुर खंडपीठ के उपाध्यक्ष न्यायमूर्ति एम.जी. गिरटकर ने कहा। उन्होंने कहा कि शासन निर्णयों का अभिप्राय हमेशा कानून के अनुरूप होता है। किसी को भी अपनी सुविधा के अनुसार इन निर्णयों की व्याख्या नहीं करनी चाहिए। कानून की चौखट में रहकर ही ये निर्णय लिए जाते हैं, जिनमें न्याय की भावना निहित होती है। जिन कर्मचारियों के साथ अन्याय हुआ है, उनके अधिकारों की रक्षा करना न्यायाधिकरण की प्राथमिकता है। यह मंच किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को न्याय प्रदान करने के लिए है, जिन्हें अन्याय का अनुभव होता है। इसके अलावा, कई मामले आपसी समझौते से सुलझाए जा सकते हैं।
लोक अदालत में 145 में से 63 मामलों का निपटारा: महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण, नागपुर (मेट) में दाखिल मामलों में आपसी सहमति के आधार पर न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 7 दिसंबर को एक विशेष लोक अदालत का आयोजन किया गया। इसमें 145 मामलों में से 63 मामलों का आपसी समझौते से निपटारा किया गया। यह लोक अदालत न्यायमूर्ति एम.जी. गिरटकर के मार्गदर्शन और उच्च न्यायालय की विधि सेवा समिति के संयुक्त सहयोग से आयोजित की गई। इस दौरान मेट के दो पैनल कार्यरत थे। पैनल प्रमुख के रूप में न्यायमूर्ति एम.एन. गिलानी और न्यायमूर्ति के.जे. रोही ने जिम्मेदारी संभाली। पैनल के सदस्य के रूप में सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.एस. दास, ए.पी. मते, अधिवक्ता आर.एम. फटिंग और पी.वी. ठाकरे ने भी योगदान दिया। लोक अदालत को सफल बनाने में महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण, नागपुर के प्रशासनिक सदस्य नितिन गद्रे, न्यायिक सदस्य एम.ए. लवेकर, प्रबंधक न्यायमूर्ति पी.वी. बुलबुले और अन्य कर्मचारियों ने विशेष प्रयास किए।










