नई दिल्ली – अमेरिकी कॉलेजों में पढ़ाई के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में हाल के वर्षों में बदलाव देखने को मिल रहा है। वीज़ा साक्षात्कारों के निलंबन, शिक्षा की बढ़ती लागत और अमेरिका में सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता ने छात्रों को वैकल्पिक गंतव्यों की ओर मोड़ दिया है। मुंबई स्थित एडमिशन कंसल्टेंट अखिल दासवानी का कहना है कि “डर की संस्कृति” के कारण छात्र अब ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों को प्राथमिकता देने लगे हैं। उन्होंने बताया कि अब केवल 20% छात्र ही केवल अमेरिका में आवेदन कर रहे हैं, जबकि पहले यह आंकड़ा 50-60% था। विदेशी छात्रों से अमेरिकी विश्वविद्यालयों को मिलने वाला राजस्व भी चिंता का विषय बन गया है। उदाहरण के लिए, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी विदेशी छात्रों से $19,178 प्रति सेमेस्टर लेती है, जबकि स्थानीय छात्रों से केवल $6,500। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में विदेशी छात्रों की संख्या 25-30% तक है, जो विश्वविद्यालयों की आय का बड़ा हिस्सा है। एडमिशन एक्सपर्ट विरल दोशी ने कहा कि पेशेवर पाठ्यक्रम जैसे एमबीए, कानून और आर्किटेक्चर विदेशी छात्रों पर निर्भर हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “अब माता-पिता जोखिम नहीं लेना चाहते, भले ही वे खर्च उठा सकते हैं।” हालांकि अमेरिका अभी भी शिक्षा के लिए शीर्ष गंतव्य बना हुआ है, विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा माहौल ने छात्रों की सोच को बदल दिया है। दासवानी का मानना है कि यह प्रवृत्ति पलट सकती है, लेकिन फिलहाल छात्र अपने विकल्प खुले रखना पसंद कर रहे हैं।










