नागपुर. भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित रखने के लिए सभी प्रकार की लिपियों का संरक्षण आवश्यक है। यह प्रतिपादन राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलगुरु डॉ. राजेंद्र काकडे ने किया। विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग और महाराष्ट्र सरकार के पुरालेख संचालनालय, मुंबई के संयुक्त तत्वावधान में मोडी लिपि प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इस कार्यशाला का उद्घाटन मंगलवार, 11 फरवरी 2025 को इतिहास विभाग के सभागार में किया गया। इस अवसर पर डॉ. काकडे ने मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र काकडे ने की। इस दौरान महाराष्ट्र सरकार के पुरालेख संचालनालय के शोध सहायक श्री संजय आवळे, शोध सहायक श्री भरत गवळी, विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विद्याशाखा अधिष्ठाता डॉ. शामराव कोरेटी प्रमुख रूप से उपस्थित थे। डॉ. काकडे ने कहा कि यदि लिपियां विलुप्त हो जाएंगी, तो इतिहास भी लुप्त हो जाएगा, इसलिए लिपियों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय में पूरे विश्व से विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे, जहां अनेक लिपियों में लिखे ग्रंथ उपलब्ध थे। आज भी 16 हजार से अधिक हस्तलिखित पांडुलिपियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि मोडी लिपि मराठी भाषा से उत्पन्न हुई है और इससे ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन किया जा सकता है। यदि मोडी लिपि को पुनर्जीवित किया जाए, तो भारतीय ज्ञान विश्वभर में फैल सकता है। मोडी लिपि से मिलेगा ऐतिहासिक दस्तावेजों का ज्ञान कार्यशाला के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए डॉ. शामराव कोरेटी ने कहा कि मोडी लिपि के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र के नागपुर सहित विभिन्न संग्रहालयों में मोडी लिपि में लिखे ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं। इन दस्तावेजों से तत्कालीन राजस्व प्रणाली, भूमि व्यवस्थापन और गुप्त प्रशासनिक निर्णयों की जानकारी मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि मोडी लिपि के अध्ययन से मराठा शासनकाल की सभ्यता और संस्कृति को दुनिया के सामने लाया जा सकता है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा मोडी लिपि के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी देते हुए श्री संजय आवळे ने बताया कि छत्रपति शिवाजी महाराज के किलों के निर्माण से जुड़े आर्थिक विवरण भी मोडी लिपि में लिखे गए थे। यदि विद्यार्थी इस लिपि का प्रशिक्षण लें, तो वे ऐतिहासिक शोध में नए तथ्य उजागर कर सकते हैं। इस कार्यशाला के समन्वयक डॉ. रामभाऊ कोरेकर और सह-समन्वयक अशोक नैताम कार्यभार संभाल रहे हैं। उद्घाटन कार्यक्रम का संचालन एवं आभार प्रदर्शन डॉ. रामभाऊ कोरेकर ने किया। कार्यशाला में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने भाग लिया।










