छोटे से गाँव की गलियों में खेलती 8 साल की राधा की हँसी अब अक्सर गुम रहती है। जब उम्र किताबों, खिलौनों और कहानियों की होती है, तब राधा दिन भर ईंट भट्ठे पर काम करती है। ये कोई एक राधा की कहानी नहीं, बल्कि भारत के लाखों बच्चों की हकीकत है – जिन्हें हम ‘चाइल्ड लेबर’, ‘बाल शोषण’ या ‘झुग्गी का बच्चा’ कह कर अनदेखा कर देते हैं।
संविधान कहता है – शिक्षा अधिकार है, पर जमीनी हकीकत कुछ और है
बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अनुसार, भारत में अभी भी लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। इनमें से अधिकतर बच्चों को मजबूरी में काम करना पड़ता है – कभी घर चलाने के लिए, तो कभी किसी एजेंट के झूठे वादों में फँसकर।
“मुझे स्कूल जाना है, लेकिन मम्मी कहती हैं खाना पहले जरूरी है” – यह कहना है 10 वर्षीय इमरान का, जो होटल में बर्तन साफ करता है।
सरकारी योजनाएँ हैं, पर पहुँच कहाँ है?
सरकार ने ‘समग्र शिक्षा अभियान’, ‘मिड-डे मील’ और ‘बाल श्रम निषेध कानून’ जैसे कई कदम उठाए हैं, लेकिन जागरूकता और क्रियान्वयन की कमी के चलते इनका असर सीमित रह जाता है।
समाधान क्या है?
1. स्थानीय स्तर पर निगरानी: पंचायत, स्कूल और पुलिस की संयुक्त ज़िम्मेदारी तय हो।
2. NGO और समाज की भागीदारी: जागरूकता अभियान, हेल्पलाइन, और पुनर्वास कार्यक्रम तेज हों।
3. शिक्षा को प्रेरक और व्यावहारिक बनाया जाए, ताकि बच्चों का झुकाव स्कूल की ओर हो।
अंत में – सवाल हम सभी से है
क्या हम इन बच्चों की आँखों में फिर से सपने जगा सकते हैं? या हम केवल खबर बनाकर भूल जाएँगे?












