नागपुर. “पार्टी और संगठन जब संकट में थे, तब सुमतीताई सुकलीकर ने राष्ट्रकार्य का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्होंने संघर्षों के बीच राष्ट्र के पुनर्निर्माण के विचार को आगे बढ़ाया। उनका संघर्षमय जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा है,” इन शब्दों के साथ केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने लोकमाता सुमतीताई सुकलीकर के योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। नागपुर के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली और जनसंघ की अग्रणी नेत्री सुमतीताई सुकलीकर की जन्म शताब्दी वर्ष का समापन समारोह मंगलवार को सिविल लाइन्स स्थित डॉ. वसंत देशपांडे सभागृह में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में नितिन गडकरी अध्यक्षता कर रहे थे। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम में समिति के संयोजक प्रा. अनिल सोले, पूर्व न्यायाधीश मीरा खडक्कार, नागपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्र-कुलपति योगानंद काले, विधायक चैनसुख संचेती, और पूर्व विधायक अरुण अडसड मंच पर विशेष रूप से उपस्थित थे। इस अवसर पर ‘खेल खिलाडी खेल’ के संपादक संजय लोखंडे द्वारा संपादित विशेषांक ‘निष्ठा तुझे नाम ताई’ का विमोचन भी हुआ। गडकरी ने अपने संबोधन में कहा कि सुमतीताई ने समाज के शोषित और पीड़ित वर्ग के जीवन को बदलने के लिए पं. दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के विचारों पर काम किया। उन्होंने और उनके साथियों ने संघर्षों से भरा जीवन जिया। आज पार्टी को जो पहचान और सम्मान मिला है, उसका श्रेय उन पुराने कार्यकर्ताओं को जाता है जिन्होंने मुश्किल परिस्थितियों में काम किया। 1977 में जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने का जिक्र करते हुए गडकरी ने कहा, “उस समय मैं रिक्शा पर अनाउंसमेंट करता था। पार्टी के रिक्शा को देखकर लोग पत्थर मारते थे और पोस्टर फाड़ देते थे। लेकिन सुमतीताई झुग्गी-झोपड़ी में जाकर सेवा करती थीं।” उन्होंने कहा, “ताई हर चुनाव हारती थीं, लेकिन कभी हार नहीं मानी। उनकी जिद और संघर्ष की कहानी हमें सिखाती है कि संघर्ष ही सफलता की नींव है।” समारोह में सुमतीताई के साथ विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने वाले वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का भी सम्मान किया गया। उन्हें शॉल, पुष्पगुच्छ, पुस्तक और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “सुमतीताई ने जनसंघ का दीया लेकर हर घर तक पार्टी का काम पहुंचाया। उन्होंने चार बार चुनाव लड़ा और हार के बावजूद कभी मन से नहीं हारीं। उनकी मातृशक्ति ने पार्टी को मजबूती दी। वे न केवल कड़ी नेता थीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के लिए मातृ समान थीं।” इस प्रकार, सुमतीताई सुकळीकर के संघर्षमय जीवन और उनके योगदान को याद करते हुए कार्यक्रम का समापन हुआ।











