नागपुर. जमाअत ए इस्लामी हिंद ने लोकसभा में पेश किए गए नए वक्फ संशोधन विधेयक को वक्फ संपत्तियों को हड़पने की साजिश करार दिया है। उनके अनुसार, इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ की परिभाषा, मुतवल्ली की भूमिका और वक्फ बोर्ड के अधिकारों को बदलना है। इसमें सेंट्रल वक्फ काउंसिल और वक्फ बोर्ड के सदस्यों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव है, जिसमें गैर-मुस्लिमों को अनिवार्य सदस्य बनाने की बात की गई है। यह प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन है, जो अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक संस्थानों को स्वतंत्र रूप से चलाने का अधिकार देता है।
विधेयक के तहत, वक्फ बोर्ड के सीईओ के लिए मुस्लिम होने की शर्त हटा दी गई है और कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों के विवादों और सरकारी कब्जे का पूरा अधिकार सौंपा गया है। वक्फ ट्रिब्यूनल की भूमिका भी कलेक्टर को दी गई है, जो इस संशोधन की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। इसके अलावा, विधेयक वक्फ संपत्तियों को सरकारी कब्जे के लिए अनुकूल बनाता है और वक्फ पंजीकरण के अधिकार कलेक्टर को सौंपता है। इसमें वक्फ के रूप में इस्तेमाल की गई संपत्तियों को हटाने की शर्त भी शामिल है, जो वक्फ के सिद्धांतों का उल्लंघन है और सांप्रदायिक तत्वों को वक्फ संपत्तियों पर कब्जे का मौका दे सकता है।
जमाअत ए इस्लामी हिंद ने इस विधेयक को पूरी तरह से खारिज किया है और सरकार से इसे तुरंत वापस लेने की मांग की है। वे एनडीए में शामिल धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और विपक्ष से भी अपील करते हैं कि इस विधेयक को संसद में पारित न होने दें। यदि विधेयक पारित होता है, तो जमाअत ए इस्लामी हिंद कानूनी और लोकतांत्रिक विरोध की तैयारी कर रही है।










