पिंपलगांव का शंकरपट पहुंचा 100वें वर्ष में, 2 से 5 फरवरी तक भव्य आयोजन

Desk News. भंडारा जिले के इतिहास में पिंपलगांव का शंकरपट अपनी खास पहचान रखता है। इसे सबसे पहले 26 जनवरी 1920 को वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर तत्कालीन मालगुजार स्व. श्रीमंत चिंतामणराव घारपुरे पाटील द्वारा आयोजित किया गया था। इस वर्ष यह ऐतिहासिक शंकरपट अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है, जिसे भव्य स्तर पर मनाने की तैयारियां जोरों पर हैं। 2 से 5 फरवरी 2025 के बीच इस शताब्दी महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। इस वर्ष के शंकरपट का उद्घाटन महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित राजनेताओं एवं गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में किया जाएगा। इनमें मा. नानाभाऊ पटोले, मा. प्रफुल्ल पटेल, मा. सुनील फुंडे, परिणय फुके, अध्यक्ष शिवराम गिरीपुंजे, अध्यक्ष मदन रामटेके, मनीषा निंबांते, किशोर मडावी, अभिजीत घारपुरे पाटील एवं उनके परिवारजन विशेष रूप से शामिल होंगे। 100वें वर्ष के इस पट आयोजन का नेतृत्व सुनील भाऊ पुंडे (अध्यक्ष, बीडीसीसी बैंक) एवं सरपंच श्यामभाऊ शिवणकर कर रहे हैं। बैलों के इस ऐतिहासिक शंकरपट के शताब्दी महोत्सव के अध्यक्ष नरेश नवखरे होंगे। इस वर्ष शंकरपट के लिए पट की लंबाई 1385 फीट (416 मीटर) रखी गई है, जिसमें बैलों की जोड़ी की दौड़ प्रतियोगिता होगी। विजेता जोड़ी को आकर्षक पुरस्कार दिए जाएंगे, वहीं हारने वाली जोड़ी को भी प्रोत्साहन स्वरूप इनाम दिया जाएगा। यह शंकरपट देखने के लिए महाराष्ट्र के अलावा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, खानदेश, पंजाब और आंध्र प्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। खास बात यह है कि यह आयोजन पिंपलगांव एवं आसपास के 10 गांवों का प्रमुख उत्सव माना जाता है। इसी वजह से यहां के ग्रामीण इसे पूरे हर्षोल्लास से मनाते हैं। इस ऐतिहासिक आयोजन के दौरान बड़ा बाजार, मनोरंजन कार्यक्रम एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए हैं। स्व. श्रीमंत चिंतामणराव घारपुरे पाटील ने 30 नवंबर 1919 को पुत्ररत्न की प्राप्ति के उपलक्ष्य में शंकरपट के आयोजन का संकल्प लिया था। इसके बाद, 26 जनवरी 1920 को वसंत पंचमी के दिन पहली बार पिंपलगांव में इस आयोजन की शुरुआत की गई। उस समय की सफेद रंग की बैलों की जोड़ी अब भी लोगों की स्मृतियों में बसी हुई है। पहले विजेता जोड़ी को वेसनी और झंडी पुरस्कार स्वरूप प्रदान किए गए थे। पिंपलगांव के इस शंकरपट ने 1944 में रजत जयंती, 1969 में स्वर्ण जयंती एवं 1994 में अमृत महोत्सव मनाया था। हालांकि, कोरोना महामारी और पशु क्रूरता निवारण कानून के कारण कुछ वर्षों तक यह आयोजन बाधित रहा। यह आयोजन सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी है। इस शंकरपट के माध्यम से वैवाहिक रिश्ते तय करना, आर्थिक सहयोग, सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, विचारों का आदान-प्रदान और गांव के समग्र विकास को बढ़ावा देने का कार्य किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आयोजन जाति-धर्म से परे गांव की एकता और समृद्धि को दर्शाता है। पिंपलगांव का शंकरपट न सिर्फ एक परंपरा है, बल्कि गांव के विकास और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है।

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