पुणे. प्रेम, त्याग और अपनापन का भाव मातृत्व की पहचान है। भारतीय महिलाओं में यह मातृत्व जागृत है। छत्रपति शिवाजी महाराज को गढ़ने वाली राजमाता जिजाऊ की तरह आज की महिलाओं में संकल्पित मातृशक्ति की जरूरत है, ऐसा मत राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका वी. शांताक्का ने व्यक्त किया।
गणेश सभागृह में आयोजित ‘मातृप्रेरणा’ विशेषांक के प्रकाशन कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मातृत्व को करियर की बाधा मानना उचित नहीं है। महिलाओं को मां के रूप में राष्ट्र निर्माण में अपने कर्तव्य को समझना चाहिए। जागृत देशभक्त नागरिकों की रचना के लिए संकल्पित मातृशक्ति की आवश्यकता है। लेखिका शेफाली वैद्य ने कहा कि मातृत्व केवल बच्चों को जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सांस्कृतिक विचार होता है। मातृत्व का मतलब है कि हम अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाएं। राजमाता जिजाऊ और अहिल्यादेवी ने अपने मातृत्व को देश की नागरिकता को समर्पित किया। पुरुषों में भी मातृत्व की भावना होती है, इसलिए ज्ञानेश्वरी को ‘माऊली’ कहा जाता है।
सांस्कृतिक वार्तापत्र के संपादक मिलिंद शेटे ने कहा कि सांस्कृतिक वार्तापत्र विभिन्न तरीकों से हिंदुत्व की धारा को मजबूत करने का काम कर रहा है।
वी. शांताक्का ने आगे कहा:
– गरीबी और दुख के बावजूद भारतीयों का हैप्पीनेस कोशंट अधिक है, देश की 68% महिलाएं खुश हैं।
– बांग्लादेश में मातृशक्ति के जागरूक होने के कारण हिंदुओं और अल्पसंख्यकों का संरक्षण हुआ।
– विनोबा भावे की शिक्षा अनुसार, मां त्याग की मूर्ति हैं।
– मातृशक्ति की जिम्मेदारी राष्ट्र और प्रजा निर्माण की है।
– शुभ और अशुभ की परवाह किए बिना दुख सहन कर कुटुंब के हित के लिए त्याग करने वाली भारतीय नारी।

राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका वी. शांताक्का










